संताल परगना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संताल परगना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

संताल परगना ब्लॉग पर प्रभात खबर में खबर


साथियों,

बहुते खुसी का बात है के आपके इस ब्लॉग के ऊपर दिनांक 8 अक्तूबर 2010 (शुक्रवार) के दैनिक समाचारपत्र ‘प्रभात खबर’ के नवें पन्ने ‘मांय माटी’ पर आधे पन्ने के एक पूरे कॉलम में ‘देशज गंधवाला संताली ब्लॉग’ शीर्षक से श्री ज़ेब अख्तर का, जो कि प्रभात खबर के एक प्रमुख पत्रकार हैं, एक रिपोर्ट छपा है, जिसके लिये ख़ाकसार बहुते सुक्रगुजार है।






बुधवार, 6 जनवरी 2010

‘अवतार’ और संताल

अभी पिछ्ले दिनों हम भी ‘अवतार’ फिलिम देख लिये. अहा-हा, डायरेक्टर जेम्स कैमरन की जय हो. क्या फिलिम बनाये हैं संताल परगना पर और संतालों पर. देख कर दिल खुश हो गया. कुछ देर के लिये हम संतालों का तमाम दुख-तकलीफ भुला गये. डायरेक्टर ने प्राचीन संताल परगना के अनछुए नैसर्गिक सौन्दर्य का बड़ा ही मनमोहक फिल्मांकन किया है. देखकर लगता ही नहीं है कि हमरा संताल परगना कभी इतना खूबसूरत रहा होगा. इस बारे में जितना भी बोलें, कम पड़ेगा. इसलिये चलिये, फिलिम का कहानी के तरफ.

कहानी है कि दिकुऑं (शोषकों, शोषक वर्ग) ने संताल परगना के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना सुरू कर दिया है. इसे काम के लिये उन्होने साम, दाम, दंड, भेद, सभी का रास्ता लिया है. कहानी में आगे पता चलता है कि संतालों की जो बस्ती है, उसके ठीक नीचे बेसकीमती खनिज पदार्थ का भंडार है. दिकु फिलिम के हिरो को एक संताल के चोले में संतालों के पास भेजते हैं ताकि वो उनके भेद ले कर बस्ती खाली करा सके. वहां उ संतालों के महान जीवन-दर्शन से परिचित होता है और एक संताल लड़की से प्रेम कर बैठता है. इसके बाद उसे पता चलता है कि बाकी दिकु किसी भी कीमत पर खनन कार्य तुरंत सुरू करना चाह्ते हैं चाहे इसके लिये सारे संतालों को मार कर संताल बस्ती को जला कर राख काहे नहीं कर देना पड़े. इ जानकर हिरो का हृदय परिवर्तन हो जाता है और उ दिकुओं के खिलाफ लड़ाई में संतालों का साथ देता है. दिकुओं के पास अत्याधुनिक हथयार हैं और संतालों के पास परंपरागत तीर-धनुष और दिकु हिरो की मदद. फिर भी जीत किसकी होती है ... ? संतालों की. फिलिम के अंत में संताल हिरो को अपना लेते हैं.

फिलिम का निर्देशन, संपादन, कलाकारों का अभिनय, स्पेशल इफेक्ट्स, कंप्युटर जनरेटेड इमेजरी, आदि सब कुछ बव्वाल है. इस बारे में टिप्पणी करना हमरे बूते के बाहर है. हमरी घोषणा है – फिलिम सुपरहिट है, हर किसी को देखनी चाहिये और खास तौर से संतालों को.

हम फिलिम देखकर घर लौटे और हमेशा की तरह आतो (गांव) की कुल्ही में दारे-बूट की दुपड़ुप (बैठक) में पूरे जोश के साथ चालू हो गये. लोगों (अधिकतर) ने मंत्र-मुग्ध हो कर सुना.

और फिर एक सिरे से हमरी बातों को खारिज कर दिया.

दिकु भैया बोले, “इ सब तो फिलिमे में होता है, सब मनघड़ंत बात है. (यहां इ बतला दें कि दिकु भैया दिकु नहीं हैं, उ हैं दि. कु. किसकु, यानी दिलीप कुमार किसकु, हमरे ममेरे भाई, हमसे बड़े. और अधिकतर संतालों की तरह दूसरे की बातों में दोष ढूंढ़ने वाले)

हम फौरन जवाब दिये, “इ बतवा तो सबको मालूम है कि अधिकतर फिलिम में कहानी मनगढ़ंते होता है. लेकिन फिलिम की इस्टोरी को आप एक दृष्टांत समझें.”

उ बोले, “ ठीक है. इसका मतलब परी कथाओं में भी दिकुओं के शोषण के खिलाफ संताल बिना किसी दिकु के मदद की कुछ नहीं कर सकते.”

जिद्दा भैया बीच में बोले, “बिल्कुल ठीक. दिसम गुरु को ही देख लिया जाय.”
(जिद्दा भैया हमरे मौसेरे भाई और गुरु होने के साथ-साथ हमरे अंतरंग मित्र हैं, हमसे बड़े.)

गिद भैया भी टपक पड़े, “इसीलिये तो कल दिसम गुरु की ताजपोशी के वक़्त सभी गांव वाले नारा बुलन्द कर रहे थे, कि
“दिसम गुरु गद्दी में, सारे संताल नद्दी में”” (गिद भैया, ममेरे भाई, हमसे बड़े – जिनको भी हम भैया लिखें, हमसे बड़े होंगे)

दिकु भैया खुद बात आगे बढ़ाये, “अरे, पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में दिकु नक्सल एही बतवा तो संतालों को समझा रहें हैं. हमको तो लगता है कि इ फिलिम नक्सलवे सब बनवाया होगा.”

जिद्दा भैया जवाब दिये, “एही हमारी समस्या है, कि हमारी समस्याओं का समाधान दिकु तलासते हैं. हम नहीं. और आज तो संतालों के एक तरफ दिकु सरकार है, और दूसरे तरफ नक्सल भाई. इधर कुंआ, उधर खाई.”

दिकु भैया बोले, “दिकु लोग तो हम लोग को खदेड़ते ही जा रहा है . कल पैन एम वाले खदेड़ा था, आज गोएनका ग्रुप खदेड़ रहा है. एक बेचारी मुन्नी हांसदा विस्थापन के खिलाफ खड़ी हुई थी, उसको वोट नही दे के तुम लोग पूंजीवादी के दलाल को वोट दे दिया. संताल का का होगा? कदुआ.”

जिद्दा भैया उपसंहार किये, “एही तो संताल की त्रासदी है कि हम हमेशा खदेड़े जाते रहे हैं और खदेड़े जाते रहेंगे. आज इस मुकाम पे हैं, कल पता नहीं, अपना कोई पता होगा या नहीं. और इ हमारी बानी नही है, आज से लगभग डेढ़ सौ साल पहले गुरु कोलियान हाड़ाम, मारे ‘हापड़ाम कोवाक् पुथी' में कह के गये हैं.”

हम देखे कि बैठकी में मौजूद नवयुवाओं का ग्रुप ध्यान से हमरी बातों को सुन रहा था.हम उम्मीद का एक ठन्डा सांस लिये, शायद इन्ही में से कोई ऐसा जवान उभरे जो संतालों पर होने वाले जुलुम को मिटा सके.